कहते हैं हमारे बुज़ुर्ग सयानें ,टी.वी ने बिगाड़े वरना हमारे बच्चे भी थे सयानें ।
टी .वी से बिगड़े है ये कौन जाने,दबी इच्छाओं ने पंख खोले है ये भी तो मानें ।
बंध जाए पंछी तो फड़फड़ाते है,मिलते ही पहला मौक़ा छूट जाते हैं।
टी.वी तो हमको करता है सचेत,पर देख चमक इन सितारों की हम हो जाते हैं अचेत।
लाड़लों को ख़ुद ही वाहन दिलाते हैं,और लाल इनके-बेकसूरों को उड़ाते हैं।
बात-बात पर ये गोलियाँ चलाते हैं,और माँ-बाप इन्हें प्रोटेक्शन दिलाते हैं।
इतने पर भी ये समझ नहीं पाते हैं,कि लाल इनके किन राहों पर क़दम बढ़ाते हैं।
कहने को ये माडर्न माता-पिता कहलाते हैं,पर अपने बच्चों के लिए लापरवाह क्यों हो जाते हैं।
माडर्न होने की कितनी बड़ी क़ीमत चुकाते है,बच्चों के मोह में अपनी आत्मा की बली चढ़ाते हैं।
जिन बच्चों के मोह में ये धन लुटाते हैं,वही बच्चे एक दिन इनके दिखावे की बलि चढ़ जाते हैं ।
बच्चों कों रिश्तों का मोल हम समझा नहीं पाते हैं,फिर किस कारण उनसे उम्मीद लगाते हैं।
संस्कारों को भुलाकर दिखावे कि जो खाई हम खोदते जाते हैं,एक दिन उसमें हम स्वयं गिर जाते हैं।
