ज़ख़्मी दिल चीख़-चीख़ कर करता रहा पुकार , देखने हमें न कोई आया एक बार ।
जिनके ज़ख़्मों पर हमनें मरहम लगाया हर बार, अनदेखा कर हमारे ज़ख़्मों को वो हो गए फ़रार ।
हमनें भी अब क़सम यही खाई है यार , ना कहेंगे इन रिश्तों को अपना, ना करेंगे इनसे प्यार।
ख़ुशियों के मेले लगे रहे इन की जिंदगी में लगातार, हमारा क्या है हमें तो ग़मों से ही अब हो गया है प्यार ।
