( कंगन की ज़िद )

आज घर पहुंचकर देखा,पत्नी ने मेरी मेनका सा रुप रचाया है,
तब समझते मुझे ये देर ना लगी, कुछ खरीदने के लिए ही इसने ये जाल बिछाया है!


तभी उसके हाथों में एक कंगन नजर आया है, तब समझा की किसने इसका मन भटकाया है और क्यों इसने मुझे रिझाने को ये मेनका सा रूप रचाया है!

तब बड़े प्यार से बोला मैंने, प्रिय तुमने चांद सा रूप रचाया है, पर इस कंगन ने तुम्हारे इस रूप पर दाग लगाया है!


वह बोली ये कंगन हमारी पड़ोसन को उसके पति ने दिलवाया है, तुम भी ऐसा कंगन मुझे दिलवादो इसलिए ये उससे मंगवाया है!

जब जान ही गए हो की मैंने कंगन लेने का मन बनाया है,तो ये जान लो की कंगन दिलवाने में ही तुम्हारा भला समाया है!

तब मैंने बड़े प्यार से बोला प्रिय कंगन क्या मैंनें तो सिर से पांव तक तुम्हें स्वर्ण से सजाने का विचार बनाया है, पर क्या करूं प्रिय परिस्थितीयों ने मजबूर बनाया है,

तब पत्नी बोली--ऐसी कौन सी परिस्थितियां है जिन्होंने तुम्हारी पत्नी का डर भी तुम्हारे दिल से भगाया है!

मैंनें बोला, प्रिय तुम्हारे स्वास्थ्य की चिंता में मैंनें ये कदम उठाया है, क्योंकी जब से कोरोना आया है, उसने आतंक मचाया है, अब बाहर निकलने पर सरकार ने ऐतराज जताया है,

और वैसे भी प्रिय तुम मेरा वो कीमती हीरा हो जिसे तुम्हारे पिता ने मुझे थमाया है, और जिसकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व मैंने उठाया है,

अब तुम ही बताओ प्रिय हीरे का स्थान स्वर्ण कभी ले पाया है!

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