( इच्छाओं की दौड़ )

रोक लिया होता गर,पल-पल बढ़ती अपने बच्चों की इच्छाओं की दौड़ को, तो आज अग्नि ना देते उनकी चिताओं को,

जीत के साथ सिखाते, गले लगाना हार को,
तो पैसा, परीक्षा, प्यार, में स्वीकार करते हार को,

अकेलापन जिंदगी में हमने ही दिया उनको,
काश! इस तेज़ भागती जिंदगी में समय दिया होता उनको,

कभी कंधे पर हाथ रख सुख-दु:ख जानते उनका,
तो आज शायद पहलू कुछ और होता जिंदगी का,

जिद्दे पूरी कर उनकी अहं बढ़ा दिया उनका कुछ इस कदर, अब छोटी-छोटी बातों पर ही हो जाते आत्महत्या और मर्डर!

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