( साज़िशें )

बर्बादी का मेरी फसाना लिखते हैं, ये कैसे अपने हैं जो मेरी बर्बादी पर हंसते है,

जज्बातों से मेरे रोज खिलवाड़ करते हैं, दुश्मनों से हाथ मिला मेरी बर्बादी की साजिशें रचते हैं,


खंजर घोंप कर पीठ में, किसने किया ये मासूमियत से सवाल करते हैं,

वार करना है तो सीने पर करो, पीठ पर तो डरपोक वार करते है,

शेर तो सामने से वार करता है, छिपकर तो भेड़िये शिकार करते हैं ||

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