थम जाता है मेरी सासों का कारवां,
जब भी होती हो तुम मुझ पे बेवजह मेहरबॉं ,
कांप जाता है भय से मेरे जिस्म का रूंआ-रूआं,
पूछता है, मुझसे अब क्या गुनाह तुझसे हुआ,
आखिर क्यों इस दहकती ज्वाला ने, शांत ज्योती का रूप है धारण किया,
तभी बेतुके ख्यालों को अनसुना कर, जाकर उसके आगे आत्मसमर्पण किया,
पूछा उससे बढ़े प्यार से, प्रिय क्या मेरे किसी कार्ये से तुम्हारा दिल है आहत हुआ,
वह मुस्कुराते हुए बोली, नहीं आज व्रत के कारण तुम्हें यह सम्मान प्राप्त है हुआ,
आज मैं सेवा कर रहीं हूं तुम्हारी, कल तुम्हे देखूंगी मेरी सेवा करता हुआ ||
