जिस्म का रुंआ-रुंआ कर्जदार है जिसका,
उस मां की अर्थी सजाना आसान नहीं होता,
मां की अर्थी को कंधा देना आसान नहीं होता,
डर कर, घबराकर थामते थे जो आंचल उस आंचल से अपना हाथ छुड़ाना आसान नहीं होता,
मां की अर्थी को कंधा देना आसान नहीं होता,
जिससे लोरी सुनना, बातें करना अच्छा लगता था उसका यूं खामोश हो जाना बर्दाश्त नहीं होता,
मां की अर्थी को कंधा देना आसान नहीं होता,
जिस ख्याल से भी दिल सौ मौत मरता है, उस
जुदाई के पल से गुजरना आसान नहीं होता,
मां की अर्थी को कंधा देना आसान नहीं होता ||
