माँ (ममता का आंचल)

ममता के आंचल में मुझको छुपाती माँ,
सीने से अपने मुझको लगाती माँ,
थकान उतर जाती मेरी, जब गोद में सिर रखकर सहलाती माँ,
तेरी धड़कनों की लोरी फिर से मुझको सुना दो मां,
इस दिल की बेचैनी को अपनी मुस्कुराहट से मिटा दो मॉं ,
तेरे हाथों का पका और तेरे हाथों से ही खाने को मेरी रूह तरसती माँ, तेरे हाथों से खाकर ही मुझको तृप्ति होती माँ,
मेरे हर नखरें हर जिद्द को तू ही हंसकर उठाती माँ,
मेरी राहों को अपनी दुआओं से तू ही सजाती माँ,
मैं रूठ भी जाऊं तुझसे पर मुझसे तू रूठ ना पाती माँ,
बिना किसी स्वार्थ के प्यार तू ही बरसाती माँ,
कोयले की खान हूं गुणों में फिर भी मुझको अपना हीरे सा कीमती बताती माँ,
मेरे जिस्म की हर चोट पर तू तड़पती माँ,
मैं अनदेखा करूं तेरे जख्मों को, फिर भी मेरे जख्मों पर मरहम तू ही लगाती माँ,
बिना जताए मुझको मेरे लिए तू क्या-क्या कर जाती माँ !!
मैं हिस्सा हूं तेरे जिस्म का, तुझसे जुदा हो नहीं सकता,
बच्चे के लिए तो माँ से बढ़कर खुद, खुदा भी नहीं हो सकता!

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