( समय, नीयत और नियती )

अभिमानी को अपने मान का,
ज्ञानी को अपने ज्ञान का,
धनवान को अपने धन का,
सुंदरता को अपने तन का,
शक्तिशाली को अपनी शक्ति का,
भक्त को अपनी भक्ति का गुरुर जब हो जाता है,
तब समय की एक पटखनी से ये सब धरा का धरा रह जाता है,
कर्मो के फेर से यहाँ कोई नहीं बच पाता है,
समय हमारी नीयत से , हमारी नियती तय कर जाता है ||

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