बुढ़ापा(उम्र का एक पड़ाव)

वक्त नहीं निकाला तुमने उन माँ-बाप के लिए,
जाने कितनी रातें जागे जो तुम्हारी देखभाल के लिए,
नौ माह तपस्या की जिस माँ ने तुझे पाने के लिए,
नौ मिनट नहीं थे तुम्हारे पास उसके साथ समय बीताने के लिए,
जाने कितने अरमानों को मारा जिस बाप ने तेरी हर खुशी को पूरा करने के लिए,
समय नहीं था तेरे पास उस पिता को खुशीयां देने के लिए,
दीवार बनकर खड़े थे जो माता-पिता तुझे हर दुख से बचाने के लिए,
लाठी ना बना तू उनके बुढ़ापे में, उनको लड़खड़ाने से बचाने के लिए,
क्या-क्या नहीं करते माँ-बाप अपने बच्चों के चेहरे पर एक मुस्कान लाने के लिए,
और हम वृद्ध- आश्रम छोड़ आते है उन्हें खुद को जिम्मेदारी से बचाने के लिए,
जब माँ-बाप होते हैं, तब हम उनकी कद्र नहीं करते,
और जब कद्र होती है तब माँ-बाप नहीं होते,
याद रखो इस उम्र के पड़ाव पर एक दिन तुम भी आओगे,
अकेलापन दिया अपने माँ-बाप को तुमने तो अकेलापन ही पाओगे,
अपने किये कर्मों से तुम बच नहीं पाओगे |

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