बचपन की यादों में खोया है मन,ढूँढ रहा है दिल वो बचपन ।
जिसमें न ही थी चिंता ना ही उलझन,बेख़बर,बेफ़िक्र था ये मनमौजी मन।
बहन,भाइयों की यादों का सुनहरा दर्पण ,बिखर गया कैसे इसका हर कण-कण।
कर रहा है ये घायल हमारा अंतरमन ,यादों के ये टुकड़े दे रहे हैं चुभन,
कभी याद कर होती है घुटन,तो कभी गुदगुदा जाता है मन।
माँ का गोद में सिर रख वो प्यार से सहलाना,पिता का उँगली पकड़कर चलाना,
गिरने पर प्यार से गले लगाना ।दादा-दादी का हर ग़लती पर समझाना,और माता-पिता की हर डाँट से बचाना।
स्कूल कॉलेज का वक़्त सुहाना,दोस्तों के संग मौज उड़ाना ,संग यारों के हर फ़िक्र भूल जाना।
दिल देख रहा है ये कैसा सपना,काश पलट सकते हम वक़्त का वो पन्ना,और फिर से जी लेते बहन-भाइयों और यारों संग बचपन अपना ।।
