( खाली पन्ने )

बड़े-बड़े ख्वाब दिल देखता रहा,
पूरा करने को उन्हें मैं रात-रात भर जागता रहा,

अनदेखा कर अपनों को मैं दिन-रात जिंदगी की दौड़ में बस भागता रहा,

मेरे अपनों ने तो बस मुझसे वक्त और प्यार मांगा था, और मैं उन्हें अकेलेपन का उपहार देता रहा,

आज जाना की अपनों संग बनाई यादें ही है बैसाखी बुढ़ापे में, और मैं पागल उन बैसाखीयों को ही काटता रहा,

कुछ नहीं था पास याद करने को, दिल बस जिंदगी
के खाली पन्नों को ताकता रहा!

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