( प्रभू प्राप्ति अंतर्मन से )

ढूंढ रहा मुझको पगले ,मंदिरों और मसानों में,

काश! ढूंढा होता तूने अंतर्मन के तहखानों में,

चढ़ावा ऐसे चढ़ाता, जैसे खरीदारी करता हो दुकानों में,

उलझा रहा हमेशा तू, समाज के दिखावटी तानों-बानों में,

सुख ही चाहा हमेशा तूने, पर मिलता वही जो है किस्मत के खानों में,

दिन-रात चक्कर लगाता तू, गुरुओं की दुकानों में,

काश! उंगली थमायी होती ये कहकर, मदद करो जिंदगी का भवसागर पार कराने में,

मैं तो तेरे अंदर पगले, झांक ज़रा अंतर्मन के तहखानों में ||

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