उठाई कलम हाथों में तो हाथ खुद ब खुद लिखते चले गए,
आंसू लफ्जों का रूप ले हाल दिल का बयां करते चले गए,
दिल की गहराईयों में छिपा दर्द हम पन्नों पर उतारते चले गए,
स्याही भी धुंधली हो गई जैसे-जैसे हम यादों की गहराई में उतरते चले गए ||
उठाई कलम हाथों में तो हाथ खुद ब खुद लिखते चले गए,
आंसू लफ्जों का रूप ले हाल दिल का बयां करते चले गए,
दिल की गहराईयों में छिपा दर्द हम पन्नों पर उतारते चले गए,
स्याही भी धुंधली हो गई जैसे-जैसे हम यादों की गहराई में उतरते चले गए ||
बड़े-बड़े ख्वाब दिल देखता रहा,
पूरा करने को उन्हें मैं रात-रात भर जागता रहा,
अनदेखा कर अपनों को मैं दिन-रात जिंदगी की दौड़ में बस भागता रहा,
मेरे अपनों ने तो बस मुझसे वक्त और प्यार मांगा था, और मैं उन्हें अकेलेपन का उपहार देता रहा,
आज जाना की अपनों संग बनाई यादें ही है बैसाखी बुढ़ापे में, और मैं पागल उन बैसाखीयों को ही काटता रहा,
कुछ नहीं था पास याद करने को, दिल बस जिंदगी
के खाली पन्नों को ताकता रहा!
सच्चा इंसान किसी से भी डरता नहीं,
तकलीफ़ों के डर से झुका करता नहीं,
लोगों की साज़िशों की परवाह करता नहीं,
जिसका साथी खुदा हो किसी के रोके रूका करता नहीं ।।
ज़िंदादिल है जिंदगी को ज़िंदादिली से जीया करते हैं,
समाज की परवाह हम किया नहीं करते हैं ।
खुदा की दी, इस ख़ूबसूरत जिंदगी को रो-रोकर बरबाद नहीं करते है,
अपने होंठों पर मुस्कान रखकर लोगों को हर पल को मुस्कुराकर जीने की सीख दिया करते है।
हर पल मुस्कुराने वालों का इम्तिहान तो खुदा हर पल लिया करते हैं ,
वो चाहते है कि लोग देखे, की ज़िंदादिल लोग कैसे हर इम्तिहान हँसते-हँसते पार किया करते हैं ।
ऐसे लोग ही खुदा की दी , इस जिंदगी के हर रंग का मज़ा लिया करते है।
कहीं सूरत पे है पर्दा,
कहीं सीरत पे है पर्दा,
कहीं ज़ज्बात पे है पर्दा,
कहीं हालात पे है पर्दा,
कहीं हया का है पर्दा,
कहीं गुनाह पे है पर्दा,
इन सबसे ऊपर गर कोई है,
तो वो है किसी की अक्ल पे पर्दा!
आज घर घर में ये कैसी महाभारत छिडी़ है ,
अपनों के ही बीच ये कैसी होड़ लगी है,
हर कोई अपने को अपनों से श्रेष्ठ दिखा रहा,
कहीँ कोई जमीन,तो कहीं कोई जायदाद के लिए अपनों का रक्त बहा रहा ,
कहीं कोई प्रेम में आसक्त हो, अपनों का त्याग किये जा रहा ,
तो कहीं कोई बेटियों की इज्जत तार-तार किये जा रहा ,
ये कैसा अधर्म समाज में बढ़ता जा रहा ,
ये कैसा समाज है, जो ऐसे लोगों को बढ़ावा दिये जा रहा !!
खुदा की रहमत हुई तो आँखों से हर धूल छँट गई,
ख़ून के रिश्तों की सच्चाई दिख गई ,
दिल के रिश्तों की गहराई दिख गई ,
जिनके लिए करते-करते ये जिंदगी घिस गई,
आज उनकी नज़रों में हमें हमारी औक़ात दिख गई ।
आईने में दिखता अक्स शायद किसी और का था,
जिसे मैं जानती थी वो शख्स कोई और ही था,
इस अक्स के तो न जाने चेहरे कितने थे,
इन चेहरों के पीछे राज़ गहरे कितने थे,
इन राज़ों को दिल में छिपा स्वार्थ साधे कितने थे,
न जाने इन मुखौटों के शिकार हुए कितने ही अपने थे,
लगता है आईने की फितरत से वो बेखबर था,
आईना कब किसी से वफा करता था,
देखने वाले को सब उल्टा ही दिखाई पड़ता था!
रोक लिया होता गर,पल-पल बढ़ती अपने बच्चों की इच्छाओं की दौड़ को, तो आज अग्नि ना देते उनकी चिताओं को,
जीत के साथ सिखाते, गले लगाना हार को,
तो पैसा, परीक्षा, प्यार, में स्वीकार करते हार को,
अकेलापन जिंदगी में हमने ही दिया उनको,
काश! इस तेज़ भागती जिंदगी में समय दिया होता उनको,
कभी कंधे पर हाथ रख सुख-दु:ख जानते उनका,
तो आज शायद पहलू कुछ और होता जिंदगी का,
जिद्दे पूरी कर उनकी अहं बढ़ा दिया उनका कुछ इस कदर, अब छोटी-छोटी बातों पर ही हो जाते आत्महत्या और मर्डर!
झूठे रिश्तों की ये कैसी दलदल है,
दम घुट रहा जिसमें हमारा हर पल है।
रिश्तों में उठी ये कैसी हलचल है,
हर अपना झूठ से लिपा, दिखता आजकल है।
किस पर विश्वास करें ये दुविधा प्रतिपल है,
झूठे लोगों से आकर्षित हर कोइ आजकल हैं।
सच्चे लोगों का, प्रताड़ना से भरा हर पल है।
थाम तुम्हारी बाहें जब इस घर में मैं आई,
रंग–बिरंगे सपनों से थी आंखें जगमगाई ।
अपने प्यार के रंगों से तुमने मेरी दुनियाँ सजाई,
जिंदगी की इन कंटीली राहों पर चोटें भी खाई ।
और उन चोटों पर तुमने अपने प्यार की दवा थी लगाई,
फिर निकाल कांटे सारे, मेरी राहें फूलों से सजाई ।
कुछ सपनें जो छूटे थे, उनसे फिर से भेंट कराई,
मेरे नखरों को पूरा करने में सदा खुशी जताई ।
प्यार दिया, सत्कार दिया,अपने जीवन में मेरी एक खास जगह भी बनाई,
सब कहते हैं कि हमारी जोड़ी भगवान ने है बनाई,
जुआ खेला था हमनें जिसमें हमारी लाटरी है निकल आई ।
महादेव–पार्वती सी अपनी जोड़ी है बनाई, तभी एक–दूसरे के साथ हमने संपूर्णता है पाई ।
अब कोई इच्छा नहीं दिल में, ना ही सपना है बाकी,
बस इतनी सी तमन्ना है,तेरे हाथ में मेरा हाथ रहे साथी,
जिंदगी के अंतिम पल तक मेरे लबों पर तेरा नाम रहे साथी!
दोस्ती का रिश्ता खास होता है,
हर दोस्त दिल के पास होता है,
ये एक ऐसा एहसास होता है,
जिसमें एक-दूसरे पर विश्वास होता है,
दोस्त के राज़ छिपाने का इसमें पूरा प्रयास होता है,
चेहरे पर उसके मुस्कुराहट देख मन खुश, और आंसू देख मन उदास होता है,
दोस्त के लिए हर किसी से लड़ जाने का साहस बेहिसाब होता है,
वक्त के साथ कई रिश्तों में कड़वाहट और खट्टास होती है,
दोस्ती ही वो रिश्ता है जिसमें वक्त के साथ मिठास होती है,
जिसका हाथ पकड़ मन बचपन की सुनहरी यादों में खो जाए, जिसके कंधे पर सिर रख हम दिल हल्का कर पाएं,
उनके लिए यही दुआ है उनका जीवन खुशियों से भर जाए!
मां की प्यारी बेटियां, पापा की दुलारी बेटियां,
परिवार का मान बेटियां, पापा की जान बेटियां,
घर को अपनी किलकारीयों से भरती बेटीयां,
अपने प्यार की खुश्बू से बाबुल का घर महकाती बेटियां,
मां-बाप के दु:ख में सबसे पहले आंखे भिगोती बेटियां,
मां-बाप के कलेजे का गर टुकड़ा होती हैं बेटियां,
फिर क्यों शादी के बाद पराई हो जाती हैं बेटियां,
जिस घर जन्में वहां पराई, जिस घर विवाह कर जाएं वहां भी पराई ही कहलाती हैं बेटियां,
दोनों परिवारों को संपूर्ण घर बनाती हैं बेटियां,
लक्ष्मी, दुर्गा के रुप में पूजी जाती हैं बेटियां,
फिर भी पराई ही क्यों कहलाती बेटियां ?
जिस भी ह्र्दयहीन ने ये रिवाज बनाया होगा,
निश्चित ही खुदा ने उसके घर बेटी को नहीं जाया होगा!
बचपन सब से प्यारा होता है, उसमें मन बिल्कुल साफ़ होता है।
अपनों से ही रूठना मनाना होता है, फिर कुछ ही पलों में उनके साथ नाचना गाना होता है।
लोग क्यों कहते हैं कि बचपन मुड़कर नहीं आता, क्योंकि बड़े होकर हमें अपना अहं बहुत प्यारा होता है।
बचपन जैसी जिंदगी चाहिए , तो हमें फिर बच्चा बनना होगा,
कभी अपनों से रूठना है तो उन्हें मनाना भी होगा।
एक दूसरे से टॉफ़ी चाकलेट बाँटी है तो ,
अब सुख दुख जो भी हो बाँटना होगा।
ज़िन्दगी भी कैसे–कैसे रंग दिखाती है,एक पल सुख, तो दूसरे ही पल दु:ख से रुबरु कराती है,
सुख का पहिया इतनी तेज़ी से घुमाती है,कि खुशियां सुहाने स्वप्न की तरह पल में ओझल हो जाती हैं!
दु:ख का पहिया इतनी धीमी गति से चलाती है, कि हर पल, हर घड़ी में पूरी ज़िन्दगी का सार समझा जाती है!
इसलिए पलभर की ज़िन्दगी हंसी–खुशी से बितानी है, मिलजुल कर हमको यादें अच्छी बनानी हैं,
उस विधाता को अपनी जिंदादिली दिखानी है!
क्या पता था कि अपनो के हाथों मात खांएगें,
जिनकी राहें फूलों से सजाई हमने, वो ही हमारे लिए काँटे बिछाएँगे।
काँटे बिछाने वाले भी अब झटका खाएँगे ,
जब काँटों में भी हमें मुस्कुराता पाएँगे ।
अपनी हर मुस्कुराहट से खुदा को भी ये बताएँगे,
कितने भी ले लो इम्तिहान,आपकी हर परीक्षा में हम अव्वल ही आएँगे
रोना नहीं है हमको, अब उनको रुलाना है
जान ली जिसने हमारे जवानों की,
उस चीन को , उसकी असली औकात दिखाना है,
डर जाए सपनें में भी, गर देखे हमारे जवानों को , इस कदर यारों उसका सुख-चैन उड़ाना है ,
शहादत को जवानों की बेकार ना करना है, काटकर सिर दुश्मन का शहीदों की समाधी पर चढ़ाना है,
देख तिरंगा हमारा उनकी रुह में कंपन हो, अब उसके अंदर अब इतना खौफ बिठाना है,
पर उससे पहले यारों हमें आपसी मतभेदों को मिटाना है, और अपने जवानों को ये विश्वास दिलाना है,
साथ हम भी खड़े है उनके, अब कंधे से कंधा मिलाकर दुश्मन को सबक सिखाना है!
माँ अगर धरती है , तो आसमान है पिता । हमारे अस्तित्व की पहचान है पिता ।
माँ से अगर यह देह है तो इसमें बहता रक्त है पिता ।हमारे अस्तित्व की पहचान है पिता ।
उँगली पकड़कर चलना सिखाता है पिता ।गिर जाएँ जिंदगी की दौड़ में तो उत्साह बढ़ा कर उठाता है पिता ।
ख़ुद की ख़्वाहिशें दबाकर , हमारी ख़्वाहिशें पूरी करता है पिता ।
हमारी हर छोटी-बड़ी ,ज़रूरतों का ख़्याल रखता है पिता ।
संसार में हमारी पहचान होता है पिता,पर जब हमारे नाम और काम से जाना जाता है पिता ।
तब सबके आगे गर्व से सिर उठा ,सीना चौड़ा कर इतराता है पिता ।
बाहर से अपने को कितना भी सख़्त दिखाता है पिता,पर अंदर से माँ की तरह ही संवेदनशील होता है पिता ।
माँ को ही भगवान का दर्जा हम देते हैं सदा ,पर माँ अगर पार्वती का रूप हैं तो साक्षात् महादेव हैं पिता ।
माँ अगर दिल है तो धड़कन है पिता ,
हमारे अस्तित्व की पहचान है पिता ।।
और अन्त में ,
अल्फाज़ हैं मेरे, पर मेरा एहसास है पिता,
कलम मेरी है दोस्तों, पर मेरा ज्ञान हैं पिता!
आज घर पहुंचकर देखा,पत्नी ने मेरी मेनका सा रुप रचाया है,
तब समझते मुझे ये देर ना लगी, कुछ खरीदने के लिए ही इसने ये जाल बिछाया है!
तभी उसके हाथों में एक कंगन नजर आया है, तब समझा की किसने इसका मन भटकाया है और क्यों इसने मुझे रिझाने को ये मेनका सा रूप रचाया है!
तब बड़े प्यार से बोला मैंने, प्रिय तुमने चांद सा रूप रचाया है, पर इस कंगन ने तुम्हारे इस रूप पर दाग लगाया है!
वह बोली ये कंगन हमारी पड़ोसन को उसके पति ने दिलवाया है, तुम भी ऐसा कंगन मुझे दिलवादो इसलिए ये उससे मंगवाया है!
जब जान ही गए हो की मैंने कंगन लेने का मन बनाया है,तो ये जान लो की कंगन दिलवाने में ही तुम्हारा भला समाया है!
तब मैंने बड़े प्यार से बोला प्रिय कंगन क्या मैंनें तो सिर से पांव तक तुम्हें स्वर्ण से सजाने का विचार बनाया है, पर क्या करूं प्रिय परिस्थितीयों ने मजबूर बनाया है,
तब पत्नी बोली--ऐसी कौन सी परिस्थितियां है जिन्होंने तुम्हारी पत्नी का डर भी तुम्हारे दिल से भगाया है!
मैंनें बोला, प्रिय तुम्हारे स्वास्थ्य की चिंता में मैंनें ये कदम उठाया है, क्योंकी जब से कोरोना आया है, उसने आतंक मचाया है, अब बाहर निकलने पर सरकार ने ऐतराज जताया है,
और वैसे भी प्रिय तुम मेरा वो कीमती हीरा हो जिसे तुम्हारे पिता ने मुझे थमाया है, और जिसकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व मैंने उठाया है,
अब तुम ही बताओ प्रिय हीरे का स्थान स्वर्ण कभी ले पाया है!
हमारे अपनों ने ही हमारा दिल दुखाया है, जिनसे उम्मीद थी सहारे की, उन्हीं से ज़ख़्म पाया है।
सभी ने स्वाँग रचने वालों के झूठे आँसुओं को पोंछने के लिए हाथ बढ़ाया है,
और हमारे आँसुओं को देखने के लिए नज़रों को भी नहीं उठाया है ।
इनके इस व्यवहार ने हमें इतना समझाया है, कि दिखावे का ज़माने में , हर किसी को दिखावा ही पसंद आया है।
इसलिए मीठी ज़ुबान ने हर फरेबी को संत का ओहदा और सच्चे इंसान के हर कार्य पर संदेह जताया है ।
एक नन्हा फ़रिश्ता आया है, अपनी मासूम शरारतों से उसने उत्पात मचाया है ।
ख़ुद तो शरारत करता है , मुझे भी शरारती बनाया है ।
बोलना देर से सीखा मगर, उस छोटी उम्र में ही गेम्स में हाथ जमाया है ।
कुछ देर ना देखे मुझे तो, सारा घर सर पर उठता है ,अपने सामने पा मुझे, बार बार गले लगाता है ।
जब भी जाती बाहर कहीं , मेरा दुपट्टा माँगने लग जाता है,पूछो गर क्या करना है, बोले मम्मा ये आपका एहसास कराता है ,
बस उसका ये बोलना ही, मेरे दिल को छू जाता है ।
बहन का है लाडला , फिर भी लड़ने से बाज़ नहीं आता है ,
चोटी खींचे, चुंटी काटे, लड़ाई के लिए हर पैंतरा आज़माता है ,
जब हो जन्मदिन के उपहारों की बात, तब बहन के साथ एकता दिखलाता है ।
अपने सवालों की झ़ड़ी लगाकर , अपने पिता का इम्तिहान लेना चाहता है ,
जब तक वो अपने बाल ना नोंचें , तब तक सवाल पूछता जाता है ।
खाने का शौक़ीन है इतना,की लोरी में भी पकवानों की लिस्ट बनवाता है ,
एक भी पकवान गर छूट गया, लोरी रोक कर उनको शामिल करवाता है ।
अपनी भोली सूरत का वो फ़ायदा बहुत उठाता है, सारी शरारत करके मासूम बनकर खड़ा हो जाता है ।
अपनी इन्हीं मासूम शरारतों के कारण , मेरा लल्ला सबका लाड़ला बन जाता है ।
ज़ख़्मी दिल चीख़-चीख़ कर करता रहा पुकार , देखने हमें न कोई आया एक बार ।
जिनके ज़ख़्मों पर हमनें मरहम लगाया हर बार, अनदेखा कर हमारे ज़ख़्मों को वो हो गए फ़रार ।
हमनें भी अब क़सम यही खाई है यार , ना कहेंगे इन रिश्तों को अपना, ना करेंगे इनसे प्यार।
ख़ुशियों के मेले लगे रहे इन की जिंदगी में लगातार, हमारा क्या है हमें तो ग़मों से ही अब हो गया है प्यार ।
सोचते थे कि मुस्कुराकर जीना ही है जिंदगी, पर मुस्कुराने पर ही एतराज़ करते है सभी ।
खुद कि हँसी को तो नज़र ना लगे कभी ,पर दूसरों की हँसी को नज़र लगाते हैं सभी ।
ख़ुद तो मर-मर कर जीते है लोग,दूसरों से भी यही उम्मीद करते है लोग ।
खाई हो मुस्कुराकर जीने की क़सम किसी ने,तो मर-मर कर जीने वालों को भी हँसा देते हैं लोग ।
लोग कहते है की धीरे हँसना है संस्कारों कि पहचान,पर हम कहते हैं की खुलकर हँसना है भगवान के संस्कारों का मान ।
इस बात को अगर इंसान ले मान ,तो हो जाएगा हर दुख का निदान !!!
ये कैसी बिमारी है आई,जिसने सारी दुनिया है हिलाई !
इसे मामूली समझने की सबने कितनी बड़ी कीमत है चुकाई !
किसी पिता, किसी माता, किसी भाई, किसी बहन ने जान है गंवाई !
मौतौं का सिलसिला तब तक नहीं थमेगा भाई, जब तक दिखाओगे यूं ही लापरवाही,
थोड़ी सी सावधानी अपनाकर यदि जा सकती है तुम्हारी जान बचाई, तो क्यों नहीं पालन करते लॉकडाउन का मेरे बहन–भाई !
पुलिस,डॉक्टर,स्वास्थयकर्मी सभी ने तुम्हारे लिए जान दांव पर है लगाई, पर तुमने एक ना मानी और लॉकडाउन तोड़ने की जैसे जिद है लगाई,
अब बढ़ गया कोरेना तो सरकार पर क्यो़ं उंगली है उठाई,
यदि पहले बरतते सावधानी और होती उचित दूरी अपनाई, तो कोरोना की कब की हो गयी होती विदाई !
नकारात्मक सोच को छोड़ो की इस लॉकडाउन से मैंने आजादी है गंवाई,
सकारात्मक सोच अपनाओं की इस लॉकडाउन में , मैंने अपने परिवार संग कितनी यादें हैं बनाई !
एक नन्ही परी मेरी जिंदगी में आई,
आगमन ने उसके मेरे दिल में हलचल मचाई!
दिन रात अब उसके ही हो गए,
हम तो उसकी मासूम शरारतों में खो गए!
जी भरकर उस पर प्यार लुटाया, कभी
प्यार से तो कभी गुस्से से ममता को जताया!
अपनी तोतली जबां से जब उसने (मां) कहकर बुलाया, उस एक शब्द ने( मां)होने का एहसास कराया!
अपने नन्हें पैरों से जब उसने पहला कदम उठाया,
अपनी उंगली थमा उसके हौंसले को बढ़ाया!
दिन-रात उसे लोरियां गाकर सुलाया,
सबसे बचाकर उसे अपने आंचल में छुपाया!
मां बन सही गलत का फ़र्क उसे समझाऊंगी,
दोस्त बन उसकी हर उलझन सुलझाऊंगी!
जिंदगी की दौड़ में वो जब भी घबराएगी,
ताकत बन अपनी मां को साथ खड़ा पाएगी!
भाई-बहन की यारी सबसे प्यारी होती है,
हर रिश्ते से न्यारी और सब पर भारी होती है!
लड़े ना एक-दूजे से तो बेचैनी होती है,
एक-दूजे की खिंचाईं से ही मस्ती पूरी होती है!
चोटी ना खींचे भाई बहन की जब तक उसके हाथों में खुजली होती है, और भाई को पिटवाकर ही बहन को तसल्ली होती है!
पेट भरा हो फिर भी बहन की थाली से खाकर ही तृप्ती होती होती है, भाई के राज़ छुपाने की भी रिश्वत होती है,
लाख लड़े एक-दूजे से पर दूसरों के आगे एकतापूरी होती है, क्योंकि एक-दूजे को पीटने की आपस में मंजूरी होती है !
हर घर में इनके खट्टे-मीठे रिश्ते से ही रौनक होती है! इनसे ही होली और दिवाली मस्ती वाली होती है!
मां-बाप की बगीया इन फूलों से ही महकती है, इनकी यही यादें उनके बुढ़ापे का सूनापन भरती हैं!
वो बचपन की सहेलियां, जिनके संग की अठखेलियाँ,
मिलकर खेले सब बचपन के खेल स्टापू, लूडो, छुपन- छुपाई और कौड़ीयां,
जाने खेल-खेल में मिलकर बनाई ,कितने गुड्डै-गुड़ियों की जोड़ियां,
जिनके संग खूब खाई हमने,चाट, पकौड़े,जलेबी और कचौड़ियां,
एक-दूजे संग बांटते थे कपड़े हों या चूड़ियां!
लड़ते-झगड़ते पर सह नहीं पाते थे एक-दूजे से दूरियां,
एक-दूजे के चेहरे से ही पढ़ लेते थे,सुख-दुख के कारण और मजबूरियां!
हमारे सब राज़ों की राज़दार होती हैं सहेलियां,
मां-बाप, भाई-बहन , हर रिश्ते की तरह ही प्यारी होती है सहेलियां!
दादू हमारे सबसे प्यारे , रहे हमेशा दिल मे हमारे।
उसूल उनके सबसे न्यारे, शरारतों में रहते साथ हमारे।
हमको दिए पल प्यारे-प्यारे, अपने प्यार से हमारे हर पल हैं सँवारे ।
क्यो कर लिए हमसें किनारें, हमें छोड़ क्यों गए भगवान के द्वारे ।
हर पल दिल आपको ही पुकारे, आप ही तो थे संसार हमारे ।
जब भी कोई अपने दादा को पुकारे, हम ऊपर तारों को निहारें ।
इस उम्मीद से तारों को निहारें, शायद देख रहे हो दादू हमें इन तारों के सहारे ।
भगवान को बस इसलिए पुकारे, कि आपके पास ही सही पर ख़ुश रहें दादू हमारे ।
कहते हैं हमारे बुज़ुर्ग सयानें ,टी.वी ने बिगाड़े वरना हमारे बच्चे भी थे सयानें ।
टी .वी से बिगड़े है ये कौन जाने,दबी इच्छाओं ने पंख खोले है ये भी तो मानें ।
बंध जाए पंछी तो फड़फड़ाते है,मिलते ही पहला मौक़ा छूट जाते हैं।
टी.वी तो हमको करता है सचेत,पर देख चमक इन सितारों की हम हो जाते हैं अचेत।
लाड़लों को ख़ुद ही वाहन दिलाते हैं,और लाल इनके-बेकसूरों को उड़ाते हैं।
बात-बात पर ये गोलियाँ चलाते हैं,और माँ-बाप इन्हें प्रोटेक्शन दिलाते हैं।
इतने पर भी ये समझ नहीं पाते हैं,कि लाल इनके किन राहों पर क़दम बढ़ाते हैं।
कहने को ये माडर्न माता-पिता कहलाते हैं,पर अपने बच्चों के लिए लापरवाह क्यों हो जाते हैं।
माडर्न होने की कितनी बड़ी क़ीमत चुकाते है,बच्चों के मोह में अपनी आत्मा की बली चढ़ाते हैं।
जिन बच्चों के मोह में ये धन लुटाते हैं,वही बच्चे एक दिन इनके दिखावे की बलि चढ़ जाते हैं ।
बच्चों कों रिश्तों का मोल हम समझा नहीं पाते हैं,फिर किस कारण उनसे उम्मीद लगाते हैं।
संस्कारों को भुलाकर दिखावे कि जो खाई हम खोदते जाते हैं,एक दिन उसमें हम स्वयं गिर जाते हैं।
कल शर्मा जी ने अपने मित्रों की आपातकालीन मिटिंग बुलाई, मिटिंग में सभी से मदद की गुहार लगाई!
बोले बचा लो, बचा लो मुझे मेरे भाई, नहीं करोगे कुछ तुम तो , होगी मेरे ही घर से आज मेरी विदाई,
हमने पूछा ऐसा क्या हुआ जो ये विपदा है आई, तब शर्मा जी ने अपनी आपबीती सुनाई,
बोले फेसबुक पर एक सुंदर युवती नजर आई,उसे देखते ही जल्दी से मित्रता की अर्जी लगाई,
तभी दौड़ते–दौड़ते तुम्हारी भाभी कमरें में आई,बोली तुमने खुद को अविवाहित बताने की कैसे गुस्ताखी दिखाई,
मैंने पूछा प्रिय किसने तुम्हारे दिल में है शंका की अग्नि जलाई, प्रिय कभी देखा है तुमने कि किसी ने है अपनी गलती दोहरायी,
वो बोली जिसे तुमने मित्रता की अर्जी भिजवाई वो और कोई नहीं वो है तुम्हारी लुगाई, तुम्हें पकड़ने की मैंने ये युक्ती लगाई,
मैंने भी अपनी नकली फेसबुक आई– डी बनाई,अपनी व्यथा सुनाकर जो मैंने नजरें उठाई,
सब मित्रों ने छड़ी उठाई बोले तू ही है जिसके कारण हम सब पर भी विपदा है आई, हमारी पत्नियों ने भी हमारी फेसबुक आई–डी पर जांच है बैठाई, अब तेरे साथ हमारी भी होगी धुलाई .
तभी हमारे मित्र ने एक युक्ति सुझाईबोले माफी से ही होगी अब हम सबकी रिहाई,
बोले इस घटना से हमने ये शिक्षा है पाई, की बीवी से कुछ नहीं छुपता मेरे भाई,वो ही है सर्वे–सर्वा वो देगी माफी तो ही होगी रिहाई.